लैगिक असमानता में उठते सवाल

संयुक्त राष्ट्र की एंजेसी ' यूएन वीमैन ' की रिपोर्ट कहती है कि परिवार विविधता वाला ऐसा स्थान है , जहाँ अगर परिवार वाले चाहे तो लड़के और लड़कियों के बीच आसानी से विविधता की बीज बो सकते हैं.
इसके लिए जरूरी है, महिलाओं की भागीदारी अपने परिवार के प्रत्येक फैसलों में परन्तु इसके लिए उन्हें अपने पति का सहयोग होना  बहुत जरूरी है. क्योंकि कई ऐसे घर जहाँ पति ही अपनी पत्नीयो ं को किसी भी प्रकार का फैसला लेने से रोक देता हैं या भाई अपने बहनों को रोक खुद घर के फैसलों में हस्तक्षेप करता है ना जाने ये परंपरा समाज में कब से चली आ रही है. अगर महिलायें चाहे तो हर समाज और राष्ट्र की तस्वीर बदल सकती हैं. पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी कहा है किसी देश की स्थिति वहाँ के महिलाओं द्वारा समक्षी जा सकती है. आज भी हमारा समाज में महिलाओं की कोई खास योगदान नहीं है. गौरतलब है कि, आज भी हमारा समाज , हमारा परिवार महिलाओं को आगे नहीं बढ़ने देता. महिलाओं के अस्तित्व, अधिकार और निर्णय को आज भी नकारने का बदस्तूर कायम है. क्योंकि महिलाओं को शुरू से ही संस्कृति और इज्जत का चादर ओढा उनके निर्णय को ढकने का हर एक प्रयास किया जाता है. ' लोग क्या कहगे' जैसे शब्द तो लगता है महिलाओं के लिए ही बने हैं. क्योंकि उनके हर निर्णय पर ये शब्द हमेशा चिपका दिये जाते हैं. पुरूष स्वतंत्र है, उन्हें समाज , संस्कृति की कोई इज्जत नहीं है, लोग क्या कहेंगे उनसे भी उन्हें फर्क नहीं पड़ता है. क्योंकि वह " पुरूष " है. पुरूष अपना सर्वोच्चता बरकरार रखने के लिए ऐसे असमानता मूलक  समाज को  निरंतरता प्रदान करते आए हैं. हमारे देश इतने कानून लाने के बाद भी औरतें अपने पति से मार खाती है, और उसे वह खुद " किस्मत " का नाम देती हैं. अगर महिलायें ये किस्मत का नाम न देकर उनके विरूद्ध कोई निर्णय लेती तो यह प्रताड़ना उन्हें क्षेलना नहीं पड़ता. लेकिन वो अक्सर साथ  देतीं हैं उनके हर फैसले और निर्णय में.अगर महिलायें ही ऐसा सोचती है तो पुरूषों के फैसले को बदलना बहुत कठिन है . 
   आज भी कई देश और समाज ऐसे है , जहाँ लड़कियों को परिवार की संपत्ति और विरासत में हिस्सा पाने का कोई अधिकार नहीं है.  वो आज भी लड़कियों को विदा कर बोल देते हैं, "अब तेरा इस घर कोई हक नहीं " . जबकि इसमें कोई संदेह नहीं है कि अब परिवार की संपत्ति और विरासत में बेटों और बेटियों के समान अधिकार है. लेकिन बेटियों से यही अपेक्षा की जाती है, कि वह खुशी - खुशी अपना हिस्सा अपने भाई के नाम कर दें.  भौतिकवाद की इस नई आंधी ने हर रिश्ते को तार - तार कर दिया है. तेजी से विस्तार लेते प्रद्योगिकी युग में भावनाएँ समाप्त होते दिख रही है.
 आज भी अधिंकाश घर में  महिलाओं को अपने स्वास्थ्य के बारे में खुद निर्णय लेने का हक नहीं है. दिन से रात तक काम करने के बाद भी उनसे यही प्रश्न पुछे जाते हैं " तुम सारा दिन करती क्या हो " ?  यही सोच पुरूष और महिलाओं के बीच असमानता का एक मुख्य कारण कहा जा सकता है. यह सोच बिना किसी बदलाव के एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी हस्तांतरित होती हैं. यह सोच बदलने के लिए खुद महिलाओं को अपने लिए खड़े होना होगा. 
कुछ समय पहले महाराष्ट्र सरकार ने एक अहम फैसला लेते हुए राज्य में विधवा प्रथा बंद करने का फैसला लिया गया है. महाराष्ट्र के हर ग्राम पंचायत में इसे लागू करने को कहा गया है.अगर किसी महिला के पति का मृत्यु हो जाता है, तो उसके अंतिम संस्कार के बाद उसके माथे से न  सिन्दूरं हटाये जायेंगे, न उनका मंगलसूत्र तोड़े जायेगे और न उन्हें उजला साड़ी पहनने को बोला जायेगा.एक लंबे समय के बाद किसी राज्य ने तो ऐसा फैसला लिया. महिलाओं का भी हक होता अपनी जिंदगी अच्छे से जीने का. उनका हक क्युं छीनना.
 महिलाओं की दशा सुधारने के लिए हमेशा कोई न कोई कदम उठाये जाते हैं . मीराबाई, भंवरी देवी ,  अमृता देवी के प्रयासों को इन उदाहरणों में शामिल किया गया है


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