प्रताड़ना झेलने को विवश आधी महिलाएँ

दुनिया का हर एक इंसान अपने सम्मान और सुरक्षा की उम्मीद  रखता है. पर अफसोस की बात, तो यह है कि आज भी हमारे देश में महिलाओं को उनके ही  घर में सम्मान का माहौल नहीं मिल रहा है. देश की आबादी का आधा हिस्सा होने के बावजूद औरतें अपने घर में अपना मानवीय हक तक भी हासिल नहीं कर पाई है. घर में उनके साथ हिंसक घटनाएं होती रहती है ं, फिर भी वह चुप्पी लगाये रहती है. अगर हम संविधान की दृष्टि से देखें तो यह बिल्कुल गलत है. "  क्योंकि आज सबको बोलने का अधिकार है अपने प्रति. शिक्षित और आत्मनिर्भर होती स्त्रियों के आकड़े भी उन्हें मानवीय हक नहीं दिला पा रहे हैं. यह प्रताड़ना मानसिक और शारीरिक दोनों तौर से उन्हें कमजोर करते रहती है.
 हाल में ही जारी भारत के अट्ठाईस राज्यों और आठ केंद्र शासित प्रदेशों के 707 जिलो के करीब साढ़े  छह लाख घरों के सर्वेक्षण के आधार पर तैयार इस बात की पुष्टि  करती है. गौरतलब है कि स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की पांचवी रिपोर्ट में सामने आया है कि देश में आज भी लगभग एक तिहाई शारीरिक या यौन हिंसा की शिकार हैं. इस दुर्व्यवहार का दुखद पक्ष यह है कि मात्र 14 प्रतिशत महिलाएँ मदद मांगने के लिए आगे आती है. विडम्बना है कि हमारे देश में आज भी महिलाएँ मात्र 15 साल की उम्र में इस दुर्व्यवहार का शिकार हो जाती है.
 घरेलू हिंसा के ज्यादातर मामले घरेलू महिलाओं के होते हैं. जहाँ पति- पत्नी का दांपत्य जीवन एक दूसरे को जोड़ कर रखने वाला होता है, ना जाने इससे कई सारे रिश्ते जुड़ते है, लेकिन जब पति ही भक्षक बन जाये वहाँ पत्नी क्या करेगी.. हमारे समाज में बेटी की बिदाई होते ही यह बात बता दी जाती है, कि अब तुम्हारा वही घर है ं . कुछ माता - पिता तो यह भी कह देते हैं, थोड़ा सह लेना " तुम लड़की हो " . जब उनके माता - पिता ही इस अवस्था में साथ न देकर सहने की सलाह देते हैं, तो बेचारी लड़कियां भी क्या करेगी. क्योंकि मायके की इज्जत का पोटली उन्हें ही पकड़ा दिया जाता है. और ना जाने लड़कियां इस पोटली को संभालने क्या - क्या नहीं सहती.
 राष्ट्रीय परिवार सर्वेक्षण की इस  रिपोर्ट के अनुसार बतीस प्रतिशत महिलाओं ने अपने जीवन में घरेलू हिंसा झेली है.  चौदह फीसद महिलाएँ भावात्मक हिंसा का शिकार बनी हैं. पत्नी पर हाथ उठाना तो वह आम समक्षते है, कई बार तो वह इस हद तक गुजर जाते हैं कि वह मार ही डालते हैं.
 गौरतलब है कि स्वास्थ्य मंत्रालय का यह पांचवा सर्वेक्षण 2019 से 2021 के बीच किया गया है. इससे यह पता चला है कि इस वैश्विक आपदा में पुरूषों का औरतों पर होने वाला दुर्व्यवहार चलता रहा है. इससे आप अनुमान लगा सकते हैं वो पुरूष कैसे होगें जहाँ लोगों को अपने परिवार की सबसे ज्यादा जरूरत होती थी, जहाँ लोगों को एक - दूसरे की अहमियत पता चलती थी वहाँ भी वैसे क्रुर पुरुष दुर्व्यवहार करते रहे.
 यह दुर्व्यवहार किस - किस परिस्थितियों में की जाती है. कभी दहेज ना देने के नाम पर उनके साथ ऐसी दुर्व्यवहार किये जाते हैं, तो कभी अगर लड़की बेटी जन्म दे दी, उस बात पर भी उनके साथ गलत व्यवहार किये जाते हैं. मारपीट कर उनकी मान - मर्यादा पर आघात करना हमारी परिवारिक व्यवस्था में आम बात हो गई है. पुरूष आज भी महिला को " कठपुतली " सामान व्यवहार करते हैं.

नाम - कुमारी ऐश्वर्या
सेंट्रल यूनिवर्सिटी आंफ क्षारखंड

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