कविता

मैं अक्सर अपनी परेशानियां ,खुद ही सुलझा लिया करती हूँ
कभी खुले आसमान में बैठ, यूँ ही मुस्कुरा लिया करती हूँ 
कभी अंधेरी रातों में बैठ, यूँ ही चांद -  तारों से बतिया लिया करती हूँ
कभी बेवजह पत्रे लिख, यूँ ही भूला लिया करती हूँ
कभी दरवाजे की कुंडिया बंद कर, यूँ ही थिरक लिया करती हूँ
कभी आइने में खुद को देख, यूँ ही समक्षा लिया करती हूँ
कभी बीते हुए पलों को सोच, यूँ ही जी लिया करती हूँ
कभी खुद से बातें कर अपनी परेशानियां, यूँ ही सुलझा लिया करती हूँ

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