विकास, पर्यावरण और सवाल
पृथ्वी हमें बार - बार यह आगाह कर रही है पर्यावरण से खेलवाड़ बंद करने को, परन्तु हम मनुष्य अपनी अलग ही जिद्द पर अड़े है. चाहे कुछ भी हो जाये लेकिन हम नहीं सुधरेंगे की कसम खा रखें है. अगर ये अपनी हरकतों पर इसी तरह कायम रहे तो यह दिन दूर नहीं जब धरती पर रहना हमारे लिए मुश्किल होता चला जाएगा.
कस्बों, शहरों, महानगरों से लेकर समुद्र, पहाड़, जंगल और धरती के परिस्थितकीय तंत्र प्रदूषण की मार से त्रस्त हैं. थोड़ी - बहुत गांवो में हरियाली देखने को मिल जाती थी आज वो भी गायब होते हुए नजर आ रहा है. वहाँ से भी हरियाली लुप्त होते हुए नजर आ रही है.
सवाल यह है कि अगर इसी तरह से हम मनुष्य पर्यावरण को क्षति पहुचाते रहे तो, धरती कैसे बचेगी?
19 वी सदी के अंत में जापान में एशिया की तांबे की खादान से निकलने वाली गैस सल्फर डाइऑक्साइड और भारी धातुओं से न केवल फसलों को, बल्कि मानव स्वास्थ्य को भारी नुकसान पहुचाया. जिससे कई प्रकार की बिमारियों से लोगों को ग्रसित हो गयें.
पंजाब में कीटनाशकों और हानिकारक रसायनों के अंधाधुंध प्रयोग के कारण हाल के वर्षों में कैंसर से होने वाली मौतों में वृद्धि देखी गई.
वायु प्रदूषण से कई प्रकार की बिमारियाँ होती है, दिल्ली कोलकाता जैसे महानगरों में हर साल हजारों लोग मर जाते हैं .
लेकिन फिर भी हम इसके प्रति सजग नहीं है. हम अपनी आदतों से मजबूर है. लम्बे - लम्बे स्लोगन या भाषण देने से कुछ नहीं होता है. जब तक हम खुद को प्रकृति के अनुरूप अग्रसर नहीं करते, तब तक यह स्लोगन कोई काम का नहीं. इसलिए सबसे पहले हमें अपने आप में बदलाव लाना होगा. हमें प्रकृति के अनुरूप अग्रसर होना होगा.
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