# मिल्खा सिंह

यों तो हर खेल जोश, जूनून और जिद्द से  जीता जाता है, मगर इनके बल पर मिल्खा सिंह ने दौड़ में जो इतिहास रचा, वह उनकी पीढ़ी के लिए एक सबक बन गया.  इनका जीवन थोड़ा कष्टप्रद था. जिस उर्म लोगों की खाने पीने, खेलने कुदरत की होती है इसी दौर में उन्हें कई परिस्थिति का सामना करना पड़ता है.
 बेहतर जीवन जीने के लिए इन्होंने कई तरह के अवसर तलाशे लेकिन उन्हें कभी ढाबे पर बर्तन धोना जैसे छोटे  - मोटे काम कर अपना जीवनयापनको कर लिया करते थे. एक बार तो वो बेटिकट पकड़ा गये थे जिसके कारण उन्हें जेल जाना पड़ गया था. उन्हें फौज में जाने का बहुत शौक था, उन्होंने उसके लिए मेहनत करनी भी शूरू कर दी थी. वह इस क्षेत्र में गये जहाँ से उनकी जिंदगी की करवट बदल ली. अभ्यास किया दौडे़ और किर्ति मान बन गयें. 
        उन्होंने दौड़ने का न्यौता स्वीकार लिया। दौड़ में मिलखा सिंह ने सरलता से अपने प्रतिद्वन्द्वियों को ध्वस्त कर दिया और आसानी से जीत गए। अधिकांशतः मुस्लिम दर्शक इतने प्रभावित हुए कि पूरी तरह बुर्कानशीन औरतों ने भी इस महान धावक को गुज़रते देखने के लिए अपने नक़ाब उतार लिए थे, तभी से उन्हें फ़्लाइंग सिख की उपाधि मिली।

        सेना में उन्होंने कड़ी मेहनत की और 200 मी और 400 मी में अपने आप को स्थापित किया और कई प्रतियोगिताओं में सफलता हांसिल की. उन्होंने सन 1956 के मेर्लबोन्न ओलिंपिक खेलों में 200 और 400 मीटर में भारत का प्रतिनिधित्व किया पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अनुभव न होने के कारण सफल नहीं हो पाए लेकिन 400 मीटर प्रतियोगिता के विजेता चार्ल्स जेंकिंस के साथ हुई मुलाकात ने उन्हें न सिर्फ प्रेरित किया बल्कि ट्रेनिंग के नए  तरीकों से अवगत भी कराया.

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