दम तोड़ती मदद की पुकार

    संकट अक्सर अनदेखे और अनजाने होते है, यह कभी बता कर नहीं आता है. जैसे हम अभी तत्काल परिस्थिति कोविड -19 की दूसरी लहर की बात करें तो किसी ने ये अपेक्षा नहीं की थी इसकी दूसरी लहर भी आएगी. आपदाएँ आने से पहले सुचित नहीं करती है.
  अगर कोई भी संकट में फंस जाए, तो इसकी जानकारी लेने के प्रबंध किए जाते है. ऐसा ही एक प्रबंध है - "हेल्पलाइन ". फोन से मदद की पुकार, जिसे कभी पुलिस सुनती है, कभी अग्नि शमन विभाग, अस्पताल आदि.  विडम्बना है कि अगर आप इस पर टेलीफोन लगाते हैं तो कोई न कोई  समस्या जरूर आएगी. क्योंकि यह बस कहने को है कि यह जनता के लिए 24 घंटे उपलब्ध है परन्तु सही मायने में यह बहुत कम ही होता है. कभी - कभी तो टेलिफोन की घंटी लगातार बजेगी लेकिन उठाने के लिए कोई नहीं होगें और कभी - कभी तो यह भी संतुष्टि नहीं मिलती है.
  अपराध, बाल अधिकारों की वंचना, शोषण आग, बिमारी की आपदा आदि तमाम स्थितियों से उबारने में मदद मांगने के लिए अक्सर लोग टेलीफोन के शरण में जाते है परन्तु वह केवल देखने माञ या कहने माञ भर है. नंबर पर तो कभी फोन ही नहीं लगते अगर कभी लग भी जाए तो आपदा प्रबंधन तब आते जब अधिकांश काम हो गयें हो.  
   आपने बच्चन में अनुवाद जरूर बनाये होंगे " पुलिस के आने से पहले चोर भाग चुका था ". कभी आपने इस पर गौर किया है ऐसा क्युं लिखा है? 
  हमारी प्रशासन तथा सरकार की भी ठिल्लनता है जो ऐसी स्थिति हमारे देश की हो गई है.

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