सामुदायिक प्रयास से संकट का सामना
देश में महामारी से हालात इतने बदतर हो गए है कि इससे निपटने के उपलब्ध सारे संसाधन नाकाफी साबित हो रहे है. स्वास्थ्य क्षेत्र पर भारी दबाव है. प्रतिदिन हाजारो की संख्या में मरीज भर्ती हो रहें हैं. जिसके लिए कोई प्राप्त सुविधा उपलब्ध नहीं है. आक्सीजन की कमी के कारण लोग मर रहे हैं. आक्सीजन और उसके उत्पादन से जुड़े उपकरणों, दवाइयों, बचाव के किट व अन्य जरूरी समान दूसरे देश भारत को दे रहे है. स्वास्थ्य क्षेत्र अचानक आए दबाव से लडखडा गया है. चिकित्सों , नर्सों को भी भारी कमी का सामना भी करना पड़ रहा है. हालत से निपटने के लिए सारे मोर्चे खोल दिए गए हैं परंतु फिर भी हालत काबू में होते हुए नहीं दिख रहा है.
सवाल यह है कि, हमारी सरकार दूसरे फेज से निपटने के लिए तैयार क्यूँ नहीं थी? , क्या सरकार चुनाव की प्रचार - प्रसार में इतनी अंधी हो गई थी कि उसे कोरोना जैसे महामारी छोटी नजर आ रही थी. जहाँ जनता इस बात खुद से सरकार से लांकडाउन की अपील कर रही है वही सरकार के कान तले जू भी नहीं रेंग रहे हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि मई के मध्य तक हालात और विकराल रूप धारण कर सकते हैं. संक्रमितो की संख्या रोजाना 7 लाख तक भी जा सकती है. ऐसे में अगर सरकार फिर भी सुस्त नजर आती है तो हमारा देश का भविष्य काफी अंधेरा नजर आएगा.
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