अनिश्चितता का अंतर

 भारतीय अर्थव्यवस्था की दशा को लेकर, रिजर्व बैंक ने जो तस्वीर पेश की है, वह चिंताजनक है.
 अर्थव्यवस्था  चरमडा़  गई है. गौरतलब है कि पिछले साल आये इस महामारी न अर्थव्यवस्था को पुरी तरह से क्षकक्षोर दिया है. अभी हमारा देश इसको संभालने में ही लगा था कि कोरोना की दूसरी लहर ने दस्तक दे दी. इस बार कोरोना की दूसरी लहर पहले वाले लहर से ज्यादा भयावह है. बस अंतर ये है कि सरकार ने स्वयं लांकडाउन न लगा कर राज्यों को सौंप दिया. जिस कारण लोगों को थोड़ी राहत मिली. लेकिन इस बार महामारी ने एक बार फिर दस्तक दे कर अर्थव्यवस्था को पुरी तरह तोड़ दिया है. 
  रिजर्व बैंक ने अपनी सलाना रिपोर्ट में साफ कहा है कि अर्थव्यवस्था पर दूसरी लहर का असर लंबे समय तक बना रहेगा. इससे यह साफ प्रतित होता है अर्थ इतनी जल्दी अपने पुराने स्थान पर नहीं आ सकता. 
  बीते साल की पहली तिमाही में बंदी के कारण ही सकल घरेलू उत्पाद यानि जीडीपी दर शून्य से 24 फीसद नीचे आ गई  थी. 
 इस साल की भांति पिछले साल कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ गया था. कितने लोगों को रोजगार छीन गयें थे तथा कितने लोग तो रोड पर आ गये थे. ऐसे सि्थिति में मध्यवर्गीय परिवार अपने बैंक में रखें पैसे से भरण - पोषण कर रहा था.
 ऐसे में देश की अर्थव्यवस्था क्या सुधरेगी. जहाँ उस देश के नागरिक को भर पेट भोजन न मिले खाने को. कहाँ जाता है " जान है तो जहान है ". आज हमारे सामने ऐसी परिस्थिति आ गई है, जहाँ दोनों को समान रूप से बचाना  एक चुनौति हो गई है.
   पिछले साल छोटे और मक्षौले उधोग के साथ बिजली, सीमेंट, कोयला, खनन, उर्वरक, तेल और जैसे प्रमुख क्षेत्रों का बाजा बज गया था. लेकिन इस बार कूछ हद तक परिस्थिति अपने अनुकूल में है. 
 विडम्बना है कि अर्थव्यवस्था की स्थिति दयनीय होते जा रही है.

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