महामारी और गांवों का संकट

दुनिया में महामारी नये - नये रुप बदल कर हमला कर रही है.  कभी वो ब्लैक फंगस का रूप धारण कर रही है कभी व्हाइट फंगस का तो अब यैलो ं फंगस सुनने को मिल रहे हैं. ना जाने ये महामारी कितनी रूप बदल कर हमारे सामने आयेगी. 
  इस महामारी को लाने में कही न कही हम भी जिम्मेदार है. कोरोना से जल्दी ही मिली इस जीत से पनपे अति आत्मविश्वास के चलते हम भारतीय यह जानी - मानी काहावत बहुत जल्द ही भूल गए की रोग और शत्रु को कभी कम नहीं आंकना चाहिए.
 जिस कोरोना व्यवहार को अपना कर हमने महामारी को हराया था, उसे स्वयं ही उठा कर ताख पर रख दिया. हमारे मन से कोरोना जैसे शब्द गायब ही हो गयें थे. नेता, प्रशासन, जनता सब भूल गए कि महामारी अभी गई नहीं है. मौका देख कर हम पे हमला करेगी. इस बीच बंगाल चुनाव - प्रसार अपने चरम सीमा पर थे. कोई नेता अपने प्रचार को स्थगित करने का सोचा भी नहीं.
  आथिर्क, राजनीतिक सभी प्रकार की गतिविधिया सब ऐसे आयोजित होने लगें, मानो महामारी जैसी विपदा को हमने हमेशा के लिए जमीन में गांड दिया हो. किसी चीज पर कोई रोक टोक नहीं थी. 
 इस बार महामारी ने कई गुनी ताकत से हमला बोला है.  हालांकि पिछले - साल  की तरह जल्दीबाजी में पूणबंदी नहीं लगाई गई, क्योंकि सभी लोग अस्त - व्यस्त थे. कोई कुंभ, शादी - ब्याह, सैर _ सनाटे को एक स्थान से दूसरे स्थान गए थे.  गौरतलब है कि पिछले साल अचानक लगाई गई पूणबंदी से सारे लोग अस्त व्यस्त हो गयें  थे तथा कई प्रकार के कठिनाइयों को क्षेलना पड़ गया था, जिस कारण सरकार को भी कई प्रकार के अवहेलना सहनी पडी़. 
 इस बार केंद्र ने राज्य सरकारों को अपने यहाँ कि स्थिति देखते हुए व्यवस्था करने का जिम्मा सौंपा दिया ताकि अर्थव्यवस्था को एकदम क्षटका  न लगे. 
  इस महामारी ने सारे बडे़ - बडे़ अस्पतालों का पोल खोल सामने रख दिया है.  और अभी तक गांवों में एक भी अच्छी अस्पतालों का निर्माण नहीं हुआ. आज भी वही सि्थिति है जो पिछले वर्ष थी. 
 सवाल यह है कि पिछले साल  सवा साल बाद गाँव की जनता ने गांव के लिए क्या व्यवस्था की है. वहाँ आज भी स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता नहीं है.

 

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