नक्सलवाद पर " तालाबंदी " कब
हाल ही में बीते शनिवार के बीजापुर के जंगलों में नक्सलवादियों ने सुरक्षाबलों पर हमला कर दिया जिसमें 22 जवान शहादत हो गयें तथा 30 जवान घायल हो गयें.
आपको बता दे कि नक्सलियों की संख्या 2 हजार से ज्यादा थी तथा इन नक्सलियों ने घंटों तक फायरिंग करते रहीं. हमला करने वाले नक्सलियों के पास अत्याधुनिक हथियार तथा रांकेट लांचर, खतरनाक UBGL रायफल, LMG गन Ak 47 जैसे रायफल जैसे हथियार थे. राजेश्वर सिंह जो जम्मू कश्मीर का निवासी है अभी तक उसकी कोई खबर नहीं है वह शनिवार के दिन से लापता है.
आपको बता दे कि इस घटना के बाद अमित शाह ने अपनी चुनावी दौरा रद्द कर दिया. तथा नक्सलवादियों को यह चुनौती देते हुए कहा " जवानों की शहादत बेकार नहीं जायेगी " .
सबसे ज्यादा हैरानी की बात तो यह है कि नक्सलियों का खुफिया सूचना तंत्र इतना चाकचौबंद है कि उसके आगे सरकारी तंत्र बौना साबित हो रहा है. वरना ऐसी क्या कारण है जब भी सुरक्षा बल मोर्चे पर जाते हैं तो वह नक्सलियों के द्वारा घेरे जाते है.
इस तरह का कोई पहली बार नहीं है , आपको बता दे कि 11 साल पहले 6 अप्रैल 2010 को दंतेवाड़ा जिले में नक्सलियों के द्वारा हमला किये गये थे जिसमें 76 जवान मारे गए थे.
आखिर नक्सलियों से निपटने वाली रणनीति सफल क्युं नहीं होती, दशकों के बाद भी केंद्र तथा राज्य सरकार ने नक्सलियों के कमर तोड़ने में कामयाब नहीं होती. सरकार के द्वारा नक्सलियों के खिलाफ चलाए गए अभियान में जरूर कोई खामियां है जो हमें इस खामियों को दूर कर फिर से कोई नई रणनीति बनानी होगी .
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