उत्तराखंड में अग्नि तांडव

उत्तराखंड में अभी भी आग की भयावह सि्थिति बनी हुई है. आपको बता दे कि प्रत्येक साल फरवरी के मध्य जुन के चार महीने के अंतराल में जंगली जीव - जंतुओं पर्यावरण और समूची जैव विविधता को संकट मे डालने वाला यह घटनाक्रम तमाम कोशिशों के बाद भी थमता नहीं दिखता. ऐसे में सवाल है कि क्या हम ऐसी घटना के ना होने से बचा सकते हैं? या हमारी सरकारी इसके प्रति निठल्ला सी व्यवहार कर रही हैं? या सरकारी नोटों के भीड़ में इस पर धयान देना उचित नहीं समक्षती. क्योंकि अगर सरकार तनिक भी अपनी नजर डाल देती तो ऐसी भयावह  सि्थिति शायद उत्पन्न ही नहीं होती. लेकिन शायद ऐसा लगता है शायद सरकार अपनी नजर ही बंद कर ली.





आग से हुई हानि 

   अभी तक इस भीषण आग में 4 इंसानों और 7 जानवरों की मौत हो गई है. तथा 964 जगहों पर अभी भी आग लगी हुई है जिसमें नैनीताल, रामगढ़, रामनगर, ढिहरी आदि जगहों पर आग पर काबू पाना मुश्किल हो गया है. 62 हेक्टेयर जंगल आग की चपेट में है. सरकार के मुताबिक अभी तक करीब 37 लाख का नुकसान हुआ है. 2016 की आग से सबसे बड़ी आग है. आग से सिर्फ जंगल ही स्वाहा नहीं हो रहें हैं, बल्कि इससे पैदा होने वाले धुएँ और धुएँ से यातायात भी प्रभावित हो रहा है. 

आकड़े

  उत्तराखंड में पिछले साल अक्टूबर से लेकर हाल तक जंगल में आग लगने से करीब साढ़े 6 सौ मामले दर्ज हो चुकें हैं . ये आकड़े वन विभाग के हैं जो साबित करते है कि करीब डेढ़ हाजार हेक्टेयर वन क्षेत्र जंगल की आग से प्रभावित हो चुका है. 

उत्तराखंड हाईकोर्ट सलाह 

  हालात की गंभीरता को देखते हुए इस मामले में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से कृत्रिम वर्षा तकनीक का सहारा लेने की संभवनाओं पर विचार करने को कहा है. सवाल यह है कि जब हमारे पास उपक्रम है तो हम फिर हाथ पर हाथ धरें क्युं बैठे है. अभी तक इस आपदा को रोकने के लिए ठोस कदम क्युं नहीं उठाये जा रहे है.

  अभी तक हमारी स्मृतियों से अमेजन की आग विसरी नहीं है. इसके भयावह दृश्य अभी भी हमारे मस्तिष्क में बने हुए है. विडंबना है कि ऐसी भयावह स्थिति उत्पन्न होने का कारण हम मनुष्य है. आग भड़कती भले एक मामूली चिंगारी से लेकिन भड़काने वाले हम है. जैसे उत्तराखंड के जंगलों की बात करें तो वन विभाग दावे के साथ कहता है कि यह आग इंसानी गतिविधियों का नतीजा है, यानि इस आग को लगाने में कहीं ना कहीं वहां के लोग जिम्मेवार है. ऐसे में सवाल है कि क्या वहाँ के नागरिकों को समक्षा कर इस पर हमेशा के लिए रोक नहीं लगा सकते.  

  ऐसा कहा जाता है कि " कुदरत को अगर चलते रहना, तो आग जरूरी है ". इसका मतलब ऐसी आग नहीं जिसे बुक्षाने में पसीने निकल जाये और ये हठी आग अपने जिद्द पर एक अड़ी रहे. गौरतलब है कि एक सलाना आयोजन के तहत लगने या लगाई जाने वाली आग नए सृजन का रास्ता खोल देती है. ऐसा सदियों से होता आया है. 

 आग लगने के कारण

  इस साल उत्तराखंड में सदियों के दौरान 65 फीसदी तक बारिश कम हुई है. जिसके कारण जंगल उस नमी से वंचित रह गई, जो आग भड़कने से रोकने में मददगार साबित होती है. कोविड के कारण जंगलों की सफाई नहीं हुई थी.

 विशेषज्ञ की सुक्षाव 

   विशेषज्ञ का कहना है कि ऐसे तीन तरीके है, जिससे आग बुझाने में मदद मिलेगी. पहला , मशीन से जंगलों की नियमित सफाई हो और चीड़ आदि की पतियों को समय रहते हटाया जाए. दूसरा यहाँ नियंत्रित ढंग से आग लगाई जाए. आपको बता दे कि दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका कई देशों में ऐसा ही किया जाता है. तीसरा पर्वतीय इलाकों में पलायन रोक कर जंगलों पर आश्रित व्यवस्था को बढ़ावा दिया जाए जिससे जंगलों की साफ - सफाई होती रहें  जिससे आग के खतरे कम होंगे. चूकि हमारे नेतागण और योजनाकारों ने जंगलों की आग की अहमियत को अभी ठीक से समक्षा नहीं ऐसे में कहना बहुत मुश्किल है कि इन तीनों में से कोई भी नियम रास भी आयेगा. ऐसे में एकमात्र यही तरीका है कि सूचना मिलते ही विशालकाय बालि्टयों से हेलिकॉप्टर में पानी के साथ दहकते जंगलों की तरफ रवाना किया जाए और इधर गाँव और प्रशासन अपनी ताकत लगाये इसे बुक्षाने में


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