ग्रामीण रोजगार और अर्थव्यवस्था

 कोरोना महामारी के दुष्प्रभावों से इस वक्त पूरी दुनिया कराह रही है ं. भारत की अर्थव्यवस्था को भी बहुत बड़ा क्षटका लगा है. सारी सि्थिति अपने जगह से घसक गई है. 
  ऐसे हालात में ग्राम्य शक्ति और जिजीविषा ने उपलब्धियों के प्रतिमान गढें  है. आपको बता दे कि वित्त वर्ष 2020 - 2021 की पहली तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद 23.9 तक गिर गया था. लेकिन कृषि ही एकमात्र ऐसा क्षेत्र था, जिसने साकारात्मक वृद्धि दर्ज की थी. कोरोना सक्रंमण को रोकने के लिए पूर्णबंदी लागू कर सब कुछ एक ताले में बंद कर दी गई थी. जब पूर्णबंदी की घोषणा की गई थी तब हमारे देश में रबी फसल का मौसम था. इधर औधोगिक और व्यापारिक गतिविधिया भी ठप हो गई थी. लोग घरों में कैद हो गए थे. उस वक्त कई कर्मचारी को कंपनी से निकाल दिये गए थे, यूँ कहे  उनकी छटनी हो गई थी.  विदेशों से सभी लोग अपने देश को आ गयें . सभी ग्रामीण परिवेश में रहने लगे थे और लोग अपनी खेती और फसलों अपने समय को देने लगे. जिस कारण नरेंद्र मोदी ने भी  " आत्मनिर्भर भारत " की पहल करने को बोल दी. लोग हरी सब्जिया, खाद्य बनाना शुरू कर दिये. विडम्बना है कि शहरी महिलाओं को भी इस दुखद स्थिती से गुजरना पड़ा. जो महिलायें दूसरे के घर जाकर चौंका - बर्तन कर अपनी जिविकोपार्जन का खर्च निकाल लेती थी आज उस पर भी समस्या आन पड़ी थी. क्योंकि घर से निकलते ही  पुलिस के डंडे की मार पड़ने लगती थी. उस वक्त बड़े - बड़े उद्योगपतियों भारी नुकसान के कारण हांफने लगें थे लेकिन इसी बीच कुछ उघोगपतियों के चेहरे पर चमक आ गई थी.  
 गौरतलब है कि उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान , मध्यप्रदेश के ग्रामीण महिलाओं ने दालों की बडि़या, आचार और पापड़ जैसे कुटीर उद्योग शुरू किये गए जिसमें कामयाबी भी देखने को मिली. आत्मनिर्भर भारत के साथ आत्मा गाँव का विमर्श यहाँ पर बहुत प्रभावशाली देखने को मिला. इसमें कोई संदेह नहीं, भारत की समृद्धि का आधार गाँव है. जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है.

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