दम तोड़ती खेती, खुदकुशी करते किसान
आज बिहार के किसान अपनी जमीन बेचने को मजबूर होते जा रहे हैं, आखिर क्यों?
आपको बता दे कि आज बिहार के किसानों का सलाना आय 12_15 हजार रुपये है. वो भी उन्हें इतने रकम तब मिलतें है जब उनकी खेती अच्छे तरह से होती है. परन्तु अगर उनकी फसलों में कीड़े लग जाते है या बेमौसम बारिश हो जाते है तो उन्हें उतने रकम भी नहीं मिल पाते है. किसानों को जितने बचत नहीं होते उतने पैसे तो पैदावार करने में ही लग जाते है. साल 2006 में बिहार सरकार ने APMC यानी मंडी व्यवस्था खत्म कर दी थी. उसके बाद बिहार में किसान कम और मजदूर ज्यादा बचे है.
किसानों को उनके मेहनत के अनुसार भी उन्हें उतना अनाज नहीं मिलते.अगर वह गेहूं या धान की कटाई करते हैं तो उन्हें 8 बोक्षा में से 1 बोक्षा किसान को मिलते है और 7 बोक्षा मालिक के होते है. इससे आप अनुमान लगा सकते है कि अगर किसान 10 कटा की कटाई करता है और उसमें 60,70 बोक्षा निकलते है तो किसानों को कितने मिलते होंगे.
आपने बचपन में प्रेमचंद की वो कहानी तो जरूर पढी़ होगी "सवा सेर गेहूं ". ठीक इस कहानी के अनुसार आज भी किसान वैसे ही मजबूर है महाजन से पैसे लेने के लिए.
विडम्बना है कि जो किसान आज पूरे देश का पेट भरती है वही किसान आधा पेट सोती है. हमारे देश में किसान मरणासन्न स्थिति में पहुँच गये हैं.
गौरतलब है लाल बहादुर शास्त्री के द्वारा "जय जवान जय किसान " का नारा दिया गया था. परंतु उनके द्वारा दिए गए ये नारे उसी दिन मर गये जिस दिन शास्त्री जी की मौत हुई थी.
किसान को जिंदगी में पिछले कई दशकों से अच्छें दिनों के दर्शन नहीं हुए है, जिसकी वजह किसानों के लिए खेती से ज्यादा आसान आज मौत को गले लगाना हो गया है.
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्युरो के अनुसार वर्ष 1995 से 2013 तक हमारे देश में 2,96,438 किसानों ने आत्महत्या कर ली है. आपको यह अवगत करा दे कि ये सरकारी आकड़े है असली तस्वीर इससे भी भयानक है.
हमारे देश में औसतन हर दो घंटे में 3 किसान आत्महत्या यानी हर दो घंटे में 3 बार जय जवान जय किसान की मौत होती है ं.
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