सहेजना होगा बारिश का पानी

  हाँ, सही सुना आपने अब ऐसे दिन हमारे जिदंगी मे दस्तक दे रहे हैं कि अगर हम बारिश का पानी ना सहेजना शुरू किये तो यह हमारे आने वाले पीढ़ी के लिए बहुत बड़ा खतरा साबित होगा.
  हम जल प्रदूषण, जल संरक्षण के बारे में बातें तो बहुत लंबी- लंबी कर लेते है. परंतु जब खुद पे जल संरक्षण के सवाल आते है तो हम इस प्रश्न से बच निकलते है. क्यूँ हमारे पास इतना भी वक्त नहीं है कि हम अपने पर्यावरण को बचाने के लिए सोचें, जल संरक्षण करने के लिए उपाय करें तथा जागरूक करें. विडंबना है कि, हम सब जानते हुए भी ढीलापन करते हैं. क्या कभी मनुष्य इस प्रश्न पर गौर किया है, अगर हमें एक दिन पानी ना मिले तो हमारी क्या दशा होगी. वह सोचे भी क्युं उसे तो आसानी से खर्च के लिए पानी मिल जाते हैं.और कहीं - कहीं तो पानी कि मात्रा अधिक होने पर लोग दुरूपयोग करना शुरू कर देते है.अगर हम गाँव के लोगों के ही रहन_ सहन को देखें तो उन्हें क्या पता पानी की किल्लत क्या होती है. जो आजा दिल्ली के लोग इस समस्या का सामना कर रहे हैं. उन्हें तो एक मात्रा तक पानी दी जाती है, और उसके बाद बंद कर दी जाती है.
 यह हमारे सरकार द्वारा लगाये गए नियम उत्तम है, कम से कम लोग पानी के महत्व को तो समक्षेगें.
  हमारे पूर्वजों के द्वारा पहले बारिश के पानी को संरक्षित किया जाता था. बारिश होने के पहले ही तालाब को साफ कर उसमें बारिश का पानी इकट्ठा किया जाता था तथा उसे घरेलू उपयोग में लाया जाता था. यह खास कर राजस्थान के जैसलमेर में एक तालाब है गढीसर तालाब उसमें खास कर इक्ट्ठा किये जाते थे. 
 रहीम ने बहुत पहले ही अपने दोहे से पानी के महत्व के बारे में वर्णन किया था. उन्होंने कहा है, " बिन पानी सब सून " अर्थात पानी के बिना कुछ नहीं है सब सुना है. जहाँ जीवन है वहाँ पानी का महत्व है.
विकास के नाम पर मनुष्य ने पानी के संचय और संरक्षण की आवश्यकता को अनदेखा कर दिया, जो जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं में से एक है.
बारिश के पानी को सहेजना इसलिए जरूरी है कि भारत में हर साल होने वाली औसतन 1170 मिलीमीटर बारिश का अधिकांश पानी वर्षा त्रृतु के कुछ ही दिनों में बरस जाता है. 
   जल संकट के कारण पैदा होने वाली सभी अप्रिय घटनाओं से बचने का एक ही मंत्र है कि हम वर्षा जल संग्रहण के प्रति जागरूक हो. वर्षा जल संरक्षण के लिए नए तालाब खुदवाएं जाएं  और जहां कहीं उपलब्ध है. प्राचीन कुएँ, तालाब, बावडियों और कुडो का संरक्षण किया जाए. 
   हमें ऐसे काम करने के लिए मानसून की दस्तक का इंतजार नहीं करना चाहिए. 

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