हताशा में हारते लोग
हाल के बरसों में, समाज के बड़े हिस्से में हताशा बढी है. लोगों की उम्मीद टूट जाने तथा गम सहने की हिम्मत न रख पाने के कारण लोग अपनी जान के दुश्मन खुद बन रहे हैं.आजकल थोड़ी सी सम्सया या परेशानी होने पर लोग उसका हल नहीं करते वरन् उसका हल 'आत्महत्या ' ही मान लेते हैं.. इस जिंदगी के जद्दोजहद में फंस जाने के कारण कोई रास्ता स्पष्ट नजर ना आने पर लोग अपनी जान खुद ले रहे हैं. जीवन से रूठ जाने के आकड़े बढ़ रहें हैं. इसमें हर उर्म हर तबके के लोग शामिल हैं. सबसे ज्यादा चिंता की बात तो परिवारजनों का सामूहिक रूप से आत्मघाती कदम उठाना है. चाहे वो कारण व्यक्तिगत हो, आथिर्क हो, या सामाजिक और मनोवैज्ञानिक या भावात्मक जो भी कारण हो, सामूहिक आत्महत्या की प्रवृत्ति एक आदत सी बन गई है. सामूहिक आत्महत्या की प्रवृत्ति वाकई बहुत भयावह है.
बच्चों के भविष्य के लिए बड़ों का मजबूत बने रहना और बडो़ का सहारा बनने के लिए बच्चों का हिम्मत नहीं हारना हमारी सामाजिक परिवारिक व्यवस्था को थामने वाली कड़ी है. ऐसे में हर दिन सामूहिक आत्महत्या की खबर पेपर या न्यूज में देखने को मिल जाते हैं. माता - पिता जहाँ बच्चों की मजबूती बन कर उभरते है वही आज कमजोरी बनते जा रहे हैं.
आजकल बच्चे के कारण माता पिता सामूहिक आत्महत्या कर ले रहे हैं. अगर उनके बच्चे में से किसी एक बच्चे की जान चली जाती है ,तो कुछ ही दिन बाद वह अन्य अपने बच्चों के साथ आत्महत्या कर ले रहे हैं. ऐसी ही खबर सुनने को भी मिल रहें हैं.अगर समाज इनको तिरस्कार कर देता है, तो वह इस समस्या का हल ' सामूहिक आत्महत्या' ही अपना ले रहे हैं.
गौरतलब है कि, हमारा समाज भले ही किसी समस्या में सहायता ना करे परंतु वह ताने देने में पीछे नहीं रहता. चाहे कारण कुछ भी हो.
Comments
Post a Comment