रोजगार का संकट

  अर्थशास्त्री थांमस राबर्ट माल्थस ने लिखा है कि प्रकृति की मेज सिमित संख्या में अतिथियों के लिए सजाई  गई है, जो बिना बुलाए आएगें, वे भुंखे मरेंगे. हालांकि माल्थस का यह संदर्भ जनसंख्या और संसाधन से संबंधित है, मगर इसका रहस्य रोजगार और सुशासन से भी जुड़ा है.
  गोरतलब है कि हमारे देश में रोजगार एक बहुत बड़ी समस्या है. आये दिन प्रत्येक व्यक्ति इस समस्या से जुक्ष रहे हैं. हमारे देश में नई - नई तकनीक आ रहें हैं, हमारी सुविधाएँ जितनी आसान हो रही है, उतनी ही वह हमें संकट में डाल रही है.अब तो हर छोटे - मोटे काम मशीन द्वारा हो जा रहे हैं.अब मनुष्यों की कोई जरूरत ही नहीं पड़ रही,इसलिए उन्हें रोजगार की मार सहना पड़ रहा है. कई  लोग इस कारण आत्महत्या भी कर रहे हैं. अधिकांश व्यक्ति के आत्महत्या का कारण " बेरोजगारी " बनते जा रहा है.
  माल्थस ने जनसंख्या और संसाधन के अनुपात में यह भी लिखा है कि जनसंख्या गुणोत्तर रूप से बढ़ती और संसाधन समानांतर क्रम से.
 प्रश्न यह है कि आखिर बेरोजगारी कई समस्याओं की जननी क्यों है? 
  रोजगार की गाड़ी कहाँ अटक गई है यह पता ही नहीं चल रहा, यह कभी - कभी धक्के लगाने पर यह अपने स्थान से डगमगाती है. सुशासन का बयार कैसे बहे और जीवन अच्छा कैसे रहे, यह लाख टके का सवाल है, सवाल आजादी के बाद से अब तक के रोजगारमूलक ढांचे का है.
जब एनएसएसओ ने जनवरी 2019 में बेरोजगारी पर रिपोर्ट जारी कर बताया कि भारत में यह दर साढ़े चार दशक में सर्वाधिक है, तब सरकार की और से इस पर सवाल उठे थे.और इसे क्षुठा  करार कर दिया गया था.और कहाँ गया था ये अंतिम आकड़े है. सेंटर फॉर मानिटरिंग इंडियन इकोनॉमी की 2 मार्च 2020 में बेरोजगारी की दर बढ़ कर 7.78 फीसद हो गई थी.इस समय कोविड _19 का प्रभाव देखने को मिला था. पूरा देश बेरोजगारी के भंवर में फंस गया था. पूणबंदी के दैरान बेरोजगारी दर 24.2 फीसद तक जा चुका था. कोरोना काल में आस्टेलिया, इंडोनेशिया, जापान, हांगकांग, वियतनाम और चीन समेत मलेरिया जैसे देशों में सबसे अधिक युवा बेरोजगारी दर बढी.1 फरवरी 2021 को पेश बजट में सुक्ष्म, लघु और मक्षौले , विनिर्माण क्षेत्र और मेक इन इंडिया को बढ़ावा देकर रोजगार और अर्थव्यवस्था दोनों को मजबूत करने का प्रयास किया जा रहा है. देश में 25 फीसद किसान खेती से जुड़े हैं, आये दिन वह भी आत्महत्या कर रहे हैं.

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