ग्लेशियर का टूटना
उत्तराखंड के चमोली जिले में ग्लेशियर टूटने से भारी तबाही जितनी दुखद है उतना ही चिंताजनक है हमारे लिए! 7 फरवरी को आये हुए इस आपदा ने 2013 की त्रासदी की याद दिला दी! फिर से हमारे घाव ताजा कर दिए! यह आपदा 2013 की आपदा के भुगतभोगी लोगों की आंखों में पुनः आपदा का वही मंजर दौड़ लगाने लगा!
ग्लेशियर के टूटने से धौलिगंगा, त्रषिगंगा और अलकनंदा नदियों में अचानक आई बाढ से पर्वतीय क्षेत्रों में तबाही आ गई! अचानक आई इस विवडना ने कई लोगों की जान ले ली!
गौरतलब है कि, वैज्ञानिकों ने 2 वर्ष पहले ही इस आपदा के प्रति लोगों को सचेत कर दिया था! परन्तु आचानक इस आपदा ने लोगों को सोचने का समय भी ना दिया! सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक अभी तक कुल 200 लोगों की मरने की खबर आई हैं! तथा कई लोग जिंदगी और मौत से जुक्ष रहे हैं! पानी के तेज बहाव में मानव बस्तियों के बहनें की आशंका हैं!
मौसम के बदलते मिज़ाज को देखकर, इन इलाकों को अब खाली करवाया जा रहा है! क्योंकि आये दिनों मौसम प्रतिकूल नहीं रहेगा! परन्तु अब इस आपदा का भरपाई नहीं होने वाला!
अक्सर सवालों के घेरे में रहने वाला सोशल मीडिया का ,उतराखंड में आई आपदा में साकारात्मक चेहरा भी सामने आया है! घटना के कुछ ही मिनट बाद ही सोशल मीडिया पर आई सूचनाओं ने सभी को सतर्क करने में सहायता की! तथा मलवा में फंसे लोगों की जान मोबाइल के कारण ही बच पाई! अथार्त इसने भी इस परिस्थिति में अपना योगदान देकर यह साबित कर दिया कि, सोशल मीडिया भी आपके जिंदगी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता हैं!
हमें इस दुखद घड़ी में फिर एक बार प्रकृति के साथ हो रहें खिलवाड़ पर विचार करना चाहिए! आये दिनों हम तरह - तरह की खोज करते हैं परंतु इससे प्रकृति को कितनी नुकसान हो रही है, उस पर हम बात करना जरूरी नहीं समक्षते! हम प्राकृतिक चीजों से खिलवाड़ कर रहे हैं, पेड़ों की अंधाधुंध कटाई, पहाडों पर उत्खनन, पहाडों पर लगातार निर्माण जारी है! इससे प्रकृति को कितना नुकसान होगा इस पर हम विचार करना भी जरूरी नहीं समक्षते! ऐसा लगता है कि, हम मनुष्य नहीं सुधरेंगे का कसम खा कर बैठे हैं! हम अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहें हैं! यह अतिक्रमण फिर से चेता रहा है कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाया जाए, न कि उस पर अतिक्रमण हो!
इसमें कोई शक नहीं है, ग्लेशियर को पिघलने से रोकने के लिए जितनी कोशिश होनी चाहिए नहीं हो रही हैं!
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