गरीबी

     जब किसी व्यक्ति या समाज के पास जीवन जीने के लिए न्यूनतम संसाधनों की कमी पायी जाती हैं, तो उसी दशा को गरीबी कहा जाता है! अर्थात् गरीबी का तात्पर्य समान्यतः संसाधनों की कमी से हैं! लेकिन प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन द्वारा इसे नया स्वरूप दिया गया कि गरीबी संसाधनों की कमी नहीं है ं बल्कि क्षमता का कम विकसित होना है! 
    अगर हम एक क्षलक मध्यवर्गींय परिवार पर डालें तो, मध्यवर्गींय परिवार के लोग जब अपनी आरामदायक जिंदगी में किसी वस्तु की अनुभूति पाते है तो, वह अपने आप को गरीब वर्ग की श्रेणी में डाल लेते है! 
       अगर ये अपने आप को गरीब महसूस करते है तो उन इंसानों का क्या जो अपनी जिदंगी का हर प्रत्येक दिन सड़कों पर लवारिसों की तरह व्यतीत कर देते है! 
  वह गरीब इंसान जिसे रहने के लिए घर नहीं है, पेट भरने को भोजन नहीं है, तथा जिसे तन ढकने को वस्त्र नहीं है! जाड़े, गर्मी, बरसात में वह सिर्फ एक ही वस्त्र पहन कर गुजारा कर लेते है, उनसे पूछो कडा़के की ठंड क्या होती है वो  बस पुआलो पर सो कर तथा एक कंबल पर  कई ठंडी व्यतीत कर देते हैं ! वह  अलाव के पास इस भांति सोये रहते है जैसे मानों लगता है इससे अच्छी सुख कहीं नहीं मिलेगी वह बेफिक्र पड़े रहते है ! इस प्रश्न का उत्तर उन सहजादो से पुछो जिनके पास ओठने को कंबल की कमी नहीं है, अपने हाथ सेंकने को अलाव  और हीटर  जैसे सारी सुविधा मौजूद हैं  कमरे में बैठे - बैठे गर्मागर्म भोजन की कमी नहीं है उन्हें क्या पता होगा कड़ाके की ठंड किसे कहते है,पुष की रात क्या होती है! 
   आज _ कल हमारे समाज में एक नया फैशन आया है, अब छोटे- छोटे बच्चे जिनकी उम्र  किताब कोपी पकड़ने को होती है, स्कूल जाने को होती है उसके  जगह वह कटोरा पकड़ बड़ी शान से भीख मांगने को सड़कों पर निकल जातें हैं! 
 क्या हमारा देश का भविष्य सड़कों पर कटोरा लिए मिलेगा! जिस देश का भविष्य युवा पर निर्भर है वही युवा हमारे देश के भविष्य को अंधेरे में डालते दिख रहें हैं! क्या हम अपने आप को इतना कमजोर और निठल्ला बना लिए है  जो हम इस भीख नामक दो शब्द पर अपनी जिंदगी का भविष्य दांव पर रख दिये है! 
   हमारे देश हर सुचकांक में इतना पीछे क्युं रह रहा है, क्या कभी भारत की जनता इस पर विचार की है, गौर फरमाई है! अगर इस पर हम एक नजर डाले तो इस सारी समस्याओं का एक ही कारण है, बढती हुई जनसंख्या! अभी भी किसी _किसी अशिक्षित गाँव में लोग इस बढती हुई जनसंख्या पर ध्यान नहीं दे रहे है! अभी भी वहाँ हम दो हमारे दो नहीं हम दो हमारे पांच, सात के नारे कायम है! उनका भरण - पोषण कैसे होगा वह उनके लिए मायने नहीं रखता है वह अपने वंश बढाने में लगे हुए हैं ! और बाद में यही वंश दो वक्त की रोटी के लिए दर - दर की ठोकरें खाते है, और वह कुपोषित के शिकार हो जाते हैं! विडम्बना है कि लोग अभी भी छोटा परिवार सुखी परिवार के प्रति जागरूक नहीं हुए है! 
   हमारी सरकार गरीबी निवारण के लिए  अनेक कदम उठाए हैं! वह मनेरगा , मेंक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, आत्मनिर्भर भारत जैसे अनेक कदम उठा कर यह गरीबी जैसे शब्द हटाने के कोशिश में लगी हुई है! 
    जहाँ एक और गरीब लोग गरीबी की मार सह रहे है तथा अनेक लोग इस लाकडाउन में बेरोजगार हो कर सड़कों पर उतर आये वही दूसरी और आक्सफैम के एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत दुनिया के सबसे ज्यादा आथिर्क असमानता वाले देशों में एक है, जहाँ अमीर तेजी से और अमीर हो रहें है और गरीब की हालत और बिगड़ती जा रही है! 
 निष्कर्ष यह है कि पूणबंदी में जहाँ हर गरीब के काम _धंधे धीमे पड़ गए, वही ं भारतीय अरबपतियों की धन _ संपत्ति में इस दैरान 35 फीसद का इजाफा हुआ है! 

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